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तृण या स्त्री

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  तृण या स्त्री ?? हम तो बस हैं  एक तृण!! व्यर्थ समझ हमे न उखाड़ ! पशु के हम हैं बिछौना व चारा क्यों समझ रहे बेकार बिचारा ! हम ही निर्धन के अनमोल धन हम से मिलेआप्त सुलभ ईंधन ! हम ही तो डूबते के है सहारा हम संगठित बांधे छप्पर सारा! हम ही सीता मैया के थे रक्षक डरा कैसे लंकेश रावण भक्षक ! हम में शक्ति आ भक्ति  चरम है जो समझे तुच्छ उसका भरम है !!  डा भारती झा

स्त्री बनाम पुरुष 🙏

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स्त्री कौन है ??  अंत: मुखी  प्रयासरत बहिर्मुखी !! बहुमुखी  प्रशंसा पर  बन मोम पिघल गयी !! अश्रु के गर्म स्रोत  कुछ दुख स्याह से  कुछ निगाह से  बह गयी बह गयी !!!  ************* पुरुष कौन है ??  अंत: मुखी  विवशता वश बहिर्मुखी !! बहुमुखी  कर्तव्य पथ पर  बन पाषाण ढल गया !! हर्ष के नर्म ओट  कुछ सुख आगाह से  कुछ प्रवाह से  रह गया रह गया !!  ************ डा भारती झा कांटी मुजफ्फरपुर  

यादें !!

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                         यादें !!!             कुछ यादें,      कुछ टूटी फूटी यादें,      कुछ खट्टी मीठी यादें ,  अंकित हैं स्मृति पटल पर!  चिन्हित मुद्रित अटल पर !      आती हैं कुरेदने       नींद से उठाने       छिनती हैं चैन          बावरी नैन  जागती रह जाती सारी रैन !!            यादें!!!           कुछ यादें ,      कुछ टूटी फूटी यादें,      कुछ खट्टी मीठी यादें, जिन्हें सहेज रखा ज्यों फूल , कारण वो तो हैं मनोनुकूल ,      अतःमन प्रसन्न,      कभी प्रकट तो        कभी प्रच्छन्न,     सिमट कर रहती       छिन्न-भिन्न !!       यादें!!!! कभी  बरबस बरसे  कभी तन मन तरसे !! डा भारती झा  कांटी मुज़फ़्फ...

सुनो कान्हा !!

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सुनो कान्हा !! मेरे सुमन की  एक ही #अभिलाषा अब तो जानो  मेरे प्रीत की #भाषा! असुवन तेल में डुबो कजरे की बनाई बाती  नैनन के दीप जलाए #पलकें टिम टिम जाती! आस धरूं अनिमेष सांस है अभी शेष आना तूं ज्यों मोती सीप देखो! बुझ न जाय दीप!! #भारती_बिंदु #सरस

दर्पण

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  दर्पण उसने देखा इक छोटा-सा दर्पण किया स्वयं को संपूर्ण समर्पण !! दिखा उसे उसमें अपना ही रूप सुन्दर सुधर सशक्त स्वस्थ स्वरूप !! दिखाई दे गया अपना वोअनुभव जो कमाया व गवाया हर सम्भव !! चेहरे की रेखाएं उम्र बता रही थी न चाहते हुए उसको सता रही थी !! किन्तु यह क्या?दिख रहा ये कौन? जानता है !!फिर क्योंकर है मौन!! कदापि नहीं उसका यह वहम  है जो दिख रहा वो उसका अहं है !! रक्त नेत्र मध्य सख्त क्रूर कुरूप और कोई नहीं वही अहं प्रतिरूप!! त्वरित ही मुख कुटिल स्मित की रेखा आई  गई और उसने सहज ही देखा!! सौंदर्य पद प्रतिष्ठा अर्थ गर्व से युक्त सहज स्नेह संस्कार सभ्यता से मुक्त!! दिव्य दर्प युक्त विराट भाल प्रत्यर्पण परिभाषित हुआ आज नाम "दर्पण"!! डाo भारती झा मुजफ्फरपुर बिहार 

बेटा!!

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बेटा ! बहुत जल्दी ही घर में बड़े हो जाते हैं ये बेटे करतब करते करते कर्तव्य समझने लगते ! मातु स्नेह दिख जाता पिता को बता न पाते पिता का देखते श्रम  माता का तोड़ते भ्रम! जल्द उठा बोझ भारी चल पड़ते बिन सवारी हस कर आंसू पी लेते जल्दी बड़े होते ये बेटे ! #भारती_बिंदु

बेटी!!

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 बेटी !! वृष्टि प्रथम बूँद सा निर्मल  मीन समान सुनयन सजल! सृष्टि सृजित सुमन सुकर  नव कुसुमित रक्तिम अधर! इह लौकिक पारलौकिक सुख नृत्य नित्य करती सहज सगर ! कोर अवतरित यदा सुकन्या  हुई जननी संग कुटुम्ब धन्या! नृत्यति सुरभित सकला मही  प्रभु तव नत शीश पितामही ! #भारतीबिंदु